बजाज पावर प्लांट से परेशान ग्रामीण, 200 ग्रामीणों ने छोड़ा गांव
जलभराव और राख प्रदूषण से त्रस्त, 200 ग्रामीणों ने छोड़ा गांव

ग्राम मिर्चवारा कंचन पुरा मजरा में स्थित बजाज पावर प्लांट को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है।कंचन पुरा मजरा के ग्रामीणों नें प्लांट के जिम्मेदार अधिकारियो पर लगाए गंभीर आरोप ग्रामीणों का आरोप है कि प्लांट के निर्माण और संचालन के बाद से गांव की प्राकृतिक जलनिकासी पूरी तरह बाधित हो गई है, जिससे बरसात के मौसम में पूरे कंचन पुरा मजरा गांव में पानी भर जाता है। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि बारिश के दिनों में लोगों के घरों के ऊपर से पानी बहता है, दीवारें कमजोर हो रही हैं और घरेलू सामान तक नष्ट हो जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि हर साल बरसात आते ही गांव टापू में तब्दील हो जाता है। कई परिवारों के घरों में कई-कई दिनों तक पानी भरा रहता है, जिससे बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कीचड़ और गंदे पानी की वजह से संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बना रहता है।
स्थिति से मजबूर होकर करीब 200 ग्रामीण परिवारों ने गांव छोड़ दिया है और वे अपने खेतों पर अस्थायी झोपड़ियां बनाकर रहने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अपने ही गांव में रहना अब उनके लिए खतरे से खाली नहीं है, इसलिए जान-माल की सुरक्षा को देखते हुए यह कठोर फैसला लेना पड़ा।
खेती-किसानी पर भी संकट
ग्रामीणों ने प्लांट से निकलने वाली राख (ऐश) को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। किसानों का कहना है कि हवा के साथ उड़कर आने वाली राख उनकी फसलों पर जम जाती है, जिससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता घट रही है। गेहूं, चना, सरसों सहित अन्य फसलों की पैदावार पर बुरा असर पड़ा है। सैकड़ों किसानों ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि मेहनत और लागत के बावजूद उन्हें अपेक्षित उत्पादन नहीं मिल पा रहा है, जिससे आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।
प्रशासन से लगाई गुहार
ग्रामीणों ने मांग की है कि प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए और प्लांट प्रबंधन को जलनिकासी की समुचित व्यवस्था करने के निर्देश दे। साथ ही, राख प्रदूषण से प्रभावित किसानों को मुआवजा दिया जाए और भविष्य में ऐसी समस्या न हो, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन करने को मजबूर होंगे। फिलहाल मिर्चवारा गांव की स्थिति यह सवाल खड़ा कर रही है कि औद्योगिक विकास के नाम पर ग्रामीणों की बुनियादी जिंदगी और खेती-किसानी की कीमत आखिर कौन चुकाएगा।




