आंध्र प्रदेश, ईस्टर्न घाट्स – आंध्र प्रदेश के ईस्टर्न घाट्स क्षेत्र में एक स्थानीय किसानों का नेटवर्क खुद की भूमि और संस्कृति को संरक्षित करते हुए स्वदेशी बीजों को बचाने और फिर से लोकप्रिय बनाने में सफल रहा है। यह प्रयास पारंपरिक खेती और भोजन प्रणाली को पुनर्जीवित कर रहा है, जिससे स्थानीय समुदायों को शुद्ध और प्राकृतिक खाद्य सामग्री उपलब्ध हो रही है।
यह नेटवर्क, जो मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसानों का समूह है, परंपरागत स्वदेशी बीजों को संरक्षित करने के साथ-साथ बीजों के आदान-प्रदान और वितरण को भी सुनिश्चित करता है। वे इन बीजों के गुणों के महत्व को समझते हुए आधुनिक कृषि के उच्च रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों से बचाव कर रहे हैं।
स्थानीय किसान बताते हैं कि इन बीजों की खेती से न केवल पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, बल्कि फसल का स्वाद भी प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक होता है। इसके अतिरिक्त, स्वदेशी बीजों का उपयोग खेती की विविधता को बढ़ावा देता है और पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित रखने में मदद करता है।
किसान समूह ने कई वर्कशॉप और प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित किए हैं, जिनमें उन्होंने नवीनतम कृषि तकनीकों के साथ-साथ प्राचीन बीज संरक्षण के तरीकों को साझा किया। इसके अलावा, उन्होंने स्थानीय बाजारों में स्वदेशी फसलों की मांग बढ़ाने की दिशा में भी काम किया है, जिससे किसानों की आय में सुधार हुआ है।
यह पहल न केवल कृषि उत्पादकों के लिए लाभकारी साबित हो रही है, बल्कि उपभोक्ताओं के बीच भी जैविक और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों की मांग को जन्म दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के प्रयासों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और कृषि दृष्टिकोण में स्थायी बदलाव आएगा।
राज्य सरकार ने भी इस पहल को सराहा है और स्वदेशी कृषि को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाने की बात कही है। वर्तमान में इस नेटवर्क की सदस्यों की संख्या बढ़ रही है और वे अपने ज्ञान और संसाधनों के आदान-प्रदान से क्षेत्र में स्वदेशी बीजों का संरक्षण और प्रसार कर रहे हैं।
आंध्र प्रदेश के ईस्टर्न घाट्स में चल रही यह स्वदेशी बीज संरक्षण आंदोलन केवल कृषि का पुनरुद्धार नहीं बल्कि सांस्कृतिक और जैव विविधता का भी पुनरुत्थान है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए स्थायी पर्यावरण और सुरक्षित खाद्य प्रणाली सुनिश्चित करता है।




