नगर भ्रमण को निकाली गयी हाथी बाबा की यात्रा
बुंदेलखंड क्षेत्र में गणेश चतुर्थी और त्योहारों के दौरान “हाथी बाबा” (मिट्टी या कपड़े और बांस से बने कृत्रिम हाथी) की स्थापना और यात्रा निकालने की एक बेहद खास और गहरी सांस्कृतिक परंपरा है।इसी परंपरा के आधार पर ललितपुर मै रैकवार समाज द्वारा हाथी बाबा” की स्थापना कर नगर भ्रमण के लिए यात्रा निकली गयी जिसमे रैकवार समाज के वरिष्ठ माते-मुखिया उपस्थित रहे आयोजन करता श्री गरीब दास सदर ,माते श्री बालकिशन रैकवार ,श्री परमानंद रैकवार ,श्री शिव प्रसाद रैकवार, श्री शंकर रैकवार गोलू ,कालू, कल्लू चौधरी, इस विशेष आयोजन पर युवा समिति द्वारा पुष्प वर्षा की गयी जिसमे मुख्य रूप से राज रैकवार सपन, कुलदीप रैकवार,निशाक रैकवार ,संतोष रैकवार महेंद्र,भगत रैकवार वं समस्त रैकवार समाज जिला ललितपुर उपस्थित रहे नगर भ्रमण के द्वारान सेर्व समाज की माता-बहनों ने हाथी बाबा की पूजा अर्चना की वाही इस परंपरा यात्रा का मुख्य उददेश मुख्य धार्मिक और सामाजिक परस्परता हैं भगवान गणेश (विघ्नहर्ता) के स्वरूप का सम्मान भगवान गणेश का मुख हाथी का है, इसलिए लोक संस्कृति में हाथी को सीधे तौर पर भगवान गणेश का ही प्रतीक माना जाता है। गणेशोत्सव के दौरान मिट्टी के गणेश जी की मूर्ति रखने के साथ-साथ इस तरह के विशाल “हाथी बाबा” को तैयार करना बप्पा के प्रति अटूट श्रद्धा को दर्शाता है समृद्धि, राजसी वैभव और विजय का प्रतीकबुंदेलखंड के इतिहास में हाथी हमेशा से राजसी ठाट-बाट, शक्ति और विजय का प्रतीक रहा है। ऐसा माना जाता है कि जब बप्पा (गणेश जी) नगर भ्रमण पर निकलते हैं, तो वे राजाओं की तरह अपने प्रिय वाहन और भव्य स्वरूप “गजराज” पर सवार होकर आते हैं। इसलिए लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर या खुशहाली के लिए हाथी बाबा का जुलूस निकालकर उत्सव मनाते हैं बुंदेली लोक-कला और भाईचारायह परंपरा शुद्ध रूप से स्थानीय बुंदेली शिल्प कौशल को बढ़ावा देती है। बांस की खपच्चियों, टाट, मिट्टी और कपड़ों से इसे मोहल्ले के लोग मिलकर खुद तैयार करते हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे गांव या मोहल्ले के लोगों को आपस में जोड़ने और लोक संस्कृति को जीवित रखने का एक जरिया है।यात्रा के अंतिम दिनों में भगवान गणेश की मूर्तियों के साथ-साथ इन ‘हाथी बाबा’ का भी बहुत ही धूमधाम और गाजे-बाजे के साथ विसर्जन (या विदाई) किया जाता है।




