राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के रणनीतिक कदम से घिरी कांग्रेस, तीसरे प्रत्याशी के कारण क्रॉस वोटिंग का खतरा
भोपाल, मध्यप्रदेश। मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला गर्म होता जा रहा है। भाजपा ने तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को मैदान में उतराकर प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर को बेहद पेचीदा बना दिया है। इस कदम से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ गई हैं, क्योंकि अब पार्टी को अपने विधायकों के क्रॉस वोटिंग करने का खतरा मंडराने लगा है।
प्रदेश की राजनीति में यह चुनाव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा ने पहले दो उम्मीदवारों के रूप में तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल को चुना था जबकि कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को मैदान में उतारा था। लेकिन महेश केवट के तीसरे उम्मीदवार के रूप में उतारने से चुनावी गणित काफी बदल गया है। भाजपा की यह रणनीति स्पष्ट रूप से कांग्रेस विधायकों को विभाजित करने और उनका समर्थन पाने की कोशिश है।
जानकारों के अनुसार, विधानसभा में भाजपा के उम्मीदवारों की जीत के लिए कम से कम 8 कांग्रेस विधायकों का क्रॉस वोटिंग करना जरूरी होगा। इससे कांग्रेस के अंदर बड़ी राजनीतिक असंतोष की स्थिति उभर रही है। मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को लेकर कांग्रेस के अंदर अनेक दिग्गज नेताओं के नाराज होने की खबरें भी आ रही हैं, जिससे पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कांग्रेस विधायकों को लुभाने का खुलेआम संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि विकास और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व के इच्छुक लोग भाजपा का समर्थन करेंगे। वहीं कांग्रेस के नेता बार-बार पार्टी की एकता की बात कर रहे हैं और कहते हैं कि सभी विधायक मीनाक्षी नटराजन के समर्थन में मतदान करेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत और दलों की संगठित क्षमता का परीक्षण भी है। यदि भाजपा तीसरी सीट जीतने में सफल हो जाती है, तो यह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व की मजबूती साबित होगी। दूसरी तरफ अगर कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने में सफल रहती है तो आगामी विधानसभा चुनाव के लिए यह एक सकारात्मक संकेत होगा।
इस चुनाव ने मध्यप्रदेश की राजनीति में नए समीकरण बना दिए हैं और आगामी दिनों में इसे लेकर राजनीतिक हलचल तेज होगी। दोनों दल जोर आजमाईश में लग गए हैं और कोई भी पक्ष पीछे हटना नहीं चाहता। राज्यसभा चुनाव केवल एक सीट जीतने का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रदेश की भविष्य की दिशा और राजनीतिक संतुलन का अहम पहलू भी है।




